अच्छा लगा आपका आना - फुरशत मिले तो जरूर दो चार पंक्तिया पढें....हँसते रहिये, मुश्कुराते रहिये, और जीवन को इसी खूबसूरती से जीते रहिये...आपका....प्रभात

05 January 2010

तुम चली गयीं


दिखला कर सपने सारे रंगीन

लेकर वादे जीवन भर के

फिर जाने क्यूं तुम चली गयीं

में फिर से तनहा हो गया।


जब आयी थी, जीवन में मेरे

तुम छायीं थी बदली बनकर

तुम जीवन थी, तुम सावन थी

तुम योवन थी, मन-भवन थी

फिर जाने क्यूं तुम चली गयी

में फिर से तनहा हो गया।


tujh में ही ढूंडा करते थे

मतलब हम इस जीवन के

तुम दिल थीं, तुम ही धड़कन थी

तुम मेरा जीवन-दर्पण थी

pहीर जाने क्यूं तुम चली गयीं

में फिर से तनहा हो गया

में फिर से तनहा हो गया।


प्रभात सर्द्वाल

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